जीयो और जीने दो 

नन्ही मुस्कान को ज़रा पलने दो ,

मत तोड़ो उसे ,अभी खिलने दो ,

नयी कलियों को प्रस्फुटित होने दो ,

जो है सो है जैसा है उसे रहने दो
,

रज़ा उसकी मर्ज़ी में होने दो,


सुख दुःख के फेर शाश्वत है ,चलने दो ,

जो कहते हैं उन्हें कहने दो ,

सुनो सबकी, अपने मन की होने दो ,

बहते हुए भावों को ,अविरल बहने दो 

फल अच्छा या बुरा , मिलने दो 

ख़ुश रहो और ख़ुशी से रहने दो 

ज़्यादा नहीं तो बस “जियो और जीने दो “..  “निवेदिता “


P.S. : बेटियाँ  बाग़ में खिलती कलियों के समान हैं उन्हें प्रोत्साहित करो और आगे बढ़ने दो । बेटी को बचाओ और उन्हें पढ़ने दो ..  

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छलिया

छलिया

मैं मीरा बन तड़प रही ,

वो गोपियों संग रचाए रास,

दूर बसी क्यूँ मीरा भाए ?

जब रहते राधा के पास ;

 मैं प्रेम में जोगन बनी , 

उनके मन को गोपी ही भाए ।

 मैं उनका नाम रटते नहीं थकती , 

उनको मेरा नाम नहीं भाए । 

पूजूँ नित प्रातःनिशि मध्याह्न , 

पर कान्हा तो रहा छलिया

सिर्फ़ दूसरों का ही रहता ध्यान ।। 

“निवेदिता”..

Acid Burns 

I was forced to die ,

But my spirit kept me alive,

rising from the ashes,

Slowly and gradually ,

I will start living again,

the pain of being burned ,

Will heal with time, 

But whenever I will see ,

My reflection in the mirror,

I will be horrified,

Again will feel the same ,

Agony if burns will rise,

Rage will rise,

The blood in my veins,

Will boil like the heat of Sun,

The wounds they gave ,

Will get healed ,

But the scars will remain,

Throughout my Life , 

I will never be the same again .. Nivedita 

P.S. : I hope that such henious act will come to a complete end soon.

मेरा कृष्ण


चिर अंधेरों को चीरते हुए उस रोशनी के पीछे भागते चले जा रहे हैं , जो वाक़ई है ही नहीं , रेगिस्तान में प्यासे को मृगमरिचिका हो ज्यों । 

वैसे ही मात्र एक भ्रम ज़िंदगी का , कैसा खेल है यह .. एक खेल जहाँ कौन मंत्री कौन प्यादा नहीं मालूम .. कौन रानी कौन राजा नहीं मालूम और जो डोर हिला रहा है ऊपर बैठे बैठे क्या ख़ूब खेल दिखा रहा है .. 

एक काँटे में जाने कितनी मछलियाँ फाँस डाली , हर मछली के लिए अलग स्थान है दिल में उसके ,अलग कर्म और अलग धर्म , मानो अलग समय …

कोई नेत्रों में बसा अनजन ,कोई गले का हार , कोई आभूषण सा फबता हुआ बेसर तो कोई माथे पर लगा केसर । 

सभी के बीच कान्हा ऐसा सुशोभित है मानो काले शालिग्राम पर पीला चंदन , अंधेरे आकाश में चमकता चंद्र , भोर को चीरता सुरंगा लाल सूर्य। 

ऐसी मनोरम छँटा मंत्रमुग्ध किए देती है । पर वो छलिया किसी का नहीं , बस डोर हिलाता रहता है , जब जिसका खेल पूर्ण हुआ उसे ही उतार देता है , रह गया तो बस आँखों का अंजन। बाक़ी वेसर – बेसर नित नए ..


हर दिन अलग स्वाँग रचाए हुए हैं प्रभु , नित- नयी कहानी नित नए खेल , कभी -कभी वो एक अदृश्य डोर हमें ऐसे बँधती है जैसे ज़ंजीर से बांधा हाथी और वो आज़ाद अथाह ब्रह्मांड – आकाश में उड़ता परिंदा  । 

मैं प्रेम में डूबी सुबह इंतज़ार करने लगती हूँ शायद आज तो मेरे कान्हा का समय सिर्फ़ मेरा होगा , शायद आज वो पूर्णत: मेरे होंगे , सुबह नहला धुला कर तिलक -शृंगार होने के बाद इंतज़ार करने लगती हूँ ,जो भोग लग जाता है , शयन हो जाता है संध्या स्नान और अब फिर शयन .. मेरे छोर पर बस इंतज़ार .. 

फिर इंतज़ार अगले भोर का , अगले दिन का .. जाने कबतक यूँ बाँटते रहना होगा । 

कभी कभी सब मन का वहम सा लगने लगता है और मोह छूटता दिखाई देता है पर अगले क्षण मानो क्या डोर हिलाता  है वह ,सब मीठा सा लगने लगता है ,और मैं फिर मीरा बन रुक्मणी बनने के ख़्वाब संजोने लगती हूँ।


मैं तो ऐसी पापिन हूँ कि उनकी बाँसुरी से भी मुझे ईर्ष्या हो जाती है , मन ही मन कह बैठती हूँ झगड़ लेती हूँ “कान्हा बस अब ये और नहीं “.. अब ये आपके अधरों को छुए मुझसे न देखा जाएगा , अब मैं और बस मैं , अधरों से लेके धड़कनो तक ,अंग प्रत्यंग में मुझे बसालो आप, अपने चरणों में मुझे जगह देदो, परंतु अब मैं प्रेम में और नहीं रोऊँगी .. कहे देती हूँ ।  आप मुझे इतना प्रेम करो कि मेरे भावों के अश्रू ख़ुशी से छलकें और मेरे मन के मैल के साथ बुद्धि भी निर्मल हो जाए ।

मेरे ज्ञान चक्षु खोल दो , जिनसे मैं आपको प्रतिदिन निहार सकूँ, मेरे रोम रोम में आप हैं परंतु यह ईर्ष्या द्वेष फिर भी घेरे रहती है , आज ऐसी तान बजाओ की बस अब और न रहूँ इन सब मैं , और आपमें विलीन हो जाऊँ …🙏निवेदिता 


हे कान्हा आ जाओ सुन लो मेरी पुकार 

है विनती सविनय निवेदन बरामबार 

निवेदिता के प्रेम को कर लो स्वीकार 

 करो दूर मेरे मन से तम का विकार 

हो विकास मेरा,🙏 करो प्रेम का विस्तार .. ” निवेदिता “

हे राम!नहीं श्री राम कहो

राम लला को हम हरदम याद करते हैं या कहे प्रभू को पर दुखी स्वर में क्यों। गर हरदम करें तो शायद दू:ख हो ही न । बस इतना सा प्रयास और निवेदन .

IMG_20151230_170229399हे राम!नहीं श्री राम कहो,
हे , !दुःख करुणा का सूचक है,
जो याद प्रभू को करना तो,
दुःख में ही क्यूं याद करें,
नाम राम का हर पल लो, 
पर सुख में भी सुमिरन करो,
श्री , लक्षमी की का द्यूतक है
हर पल राम के चरणों में नमन🙏
नाम लेने से अगर सुख मिले,
तो हे !राम ,नहीं श्री !राम कहो,
क्योंकि श्री !,  हे!का पूरक है…. “Nivedita”