अहसासों का सफ़र..

एहसासों का सफ़र :

विवेचना एक ऐसे सफ़र कि जिसे सिर्फ़ एक कवि ही तय कर सकते हैं।

जिंदगी सतरंगी है बहुत से पहलुओं में, जब बात कविताओं कि हो तो भावनाएँ मानो सतरंगी मेघ धनुष समान सभी वर्ग के पाठक वृंद के हृदय को अखण्डित करती हैं।

पुस्तक “एहसासों का सफ़र” कवि श्री साँवर मल शर्मा “रवि” द्वारा लिखी गयी एक ऐसी ही सतरंगी एहसासों का काव्यकोष है जो “इंद्रधानुश” के भाँति विचारों के आकाश में रंग बिखेरते हुए नज़र आते हैं ।

पहले ही पन्ने से शुरू करती हूँ तो पहला रंग जो आकर्षण का केंद्र बिंदु है।

बचपन से हमारे मामाश्री के मुँह से सुनती तो आयी हूँ पर किसी पुस्तिका में पढ़ने का सौभाग्य पहली बार प्राप्त हुआ

“रविजी” ने अपनी माता जी को जो शब्दांजलि दी है,

जो कुछ इस प्रकार है: “मामाताराम के नाम” जीवनदायिनी माँ को श्री राम के समान माना है, जो स्वाभाव में विनम्रता को दर्शाता है ।

दूसरा रंग जो भाषाओं के मिलन को प्रयागरज की तरह हमारे हिंदू संस्कृति के एक अभिन्न अंग व सुंदर रंग को उकेरती नज़र आयी वह यह कि माँ “हिंदी” और माँसी “उर्दू”के शब्दों का समन्वय जिस तरह से किया है वह अतुल्य है।

अब बात करते हैं बचे हुए पाँच रंगो की तो चार चरण तो आकांक्षा,

उल्लास,

व्यथा,

मंथन,

हैं जो स्वयं उन्होंने ही पुस्तक में दर्शाएँ हैं ,

किंतु, जो मेरे मन को सबसे ज़्यादा छू हुई वह रंग है देश भक्ति का “माँ भारती” के शहीद बेटों उन वीरों के। नाम लिखी यह कविता

“नमन शहीदों के नाम”..

मात्री भूमि के अमर शहीदों,

चुका न पाये क़र्ज़ तुम्हारे।

हुए जन्म, अर्थहीन हमारे,

कर्तव्य च्युत हैं कर्म हमारे।

इन्हीं एहसासों के साथ “रवि” जी ने अपने सफ़र को अपने उपनाम के साथ सार्थक किया है, क्यूँकि इस कथन को कौन जानता “जहाँ न पहुँचे कवि वहाँ पहुँचे “रवि””। #निवेदिता

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प्रश्न?१

अंतर्मन के और बाह्य शरीर के कितने रूप होते हैं ? एक मनुष्य और गिरगिट में क्या फ़र्क़ होता है ?

प्रतीक्षारत: #निवेदिता

बदलाव

कितना कुछ बदल गया?

आस पास देखा तो इतना कुछ तो ना बदला, वही ज़मीन वही आसमान जो बदला वो पड़ोस है।

बच्चे बड़े हो गए ,बूढ़े कुछ बचे कुछ और प्रौढ़ हो गए, हम वही

और वहीं के वही हैं, बस बच्चे बड़े और आगे निकल गये। सोच अपनी वही बस उनकी बदल गयी है, बाक़ी .. कुछ भी तो नहीं बदला।

“आम” पर आज भी अंबी और नीम पर नींबोरि लगती है, हमभी वही , बस मन बदल गए हैं।

फ़र्क़ इंसानों में नहीं मनों में आगया है, शादियाँ कम तलाक़ ज़्यादा हो गए, कमाई कम दिखावा अधिक हो गया ।

साहेब कुछ नहीं बहुत कुछ बदल गया। निवेदित #निवेदिता

चाय

नाजुक पत्तियों की,

मधुर संस्कृती की,

निवेदन मान मनुहार की

झलक भारतीय सत्कार की ।

महक माटी की,

छुअन होठों की,

गर्म स्पर्श उंगलियों को,

एक प्याली “कुल्हड़ वाली चाय” की । #निवेदिता

समय (मौन मुस्कान की मार)

“समय समय की बात है ”

“चारु चंद्र को चंचल किरणें”

वे पढ़ते थे जब वे बच्चे थे, हमने भी पढ़ी आज भी पढ़ते होंगे, समय बस इतना बदला है कि साइकल ने हमारे समय में लूना ने ली और आज बाइक्स ने ले ली । लड़ते हुए बच्चे अब भी हैं, चंद्र वही, चंचलता वही, मौन वही बस हम और हमारा आज अलग ..

P.S.: “अपनी बात” पुस्तक “मौन मुस्कान की मार” लेखक श्री “आशुतोष राणा” से प्रेरित मेरे अपने विचार, निवेदित “निवेदिता”

No NOTA

NOTA क्यूँ नहीं ज़रा पढ़ें और सभी बंधु बँधवों को भी पढ़ायें : ज़रूरी है जानना । वोट अपने मन से करें पर करें जरूर NOTA पे व्यर्थ ना करें 🙏

@bhaatdaal #nivedita

“हम”- “तुम”

सुनो जो तुम हो वो “मैं” में जीते आए हो,

और “मैं” “ज़हीन” ही सही,पर “हम” में ही यहीं “कहीं”,

ढूँढोगे तो पाओगे “मैं”को “हम” में यहीं कहीं ..

कितने ओछे हो क़द में, चाहे पद में ऊँचे खड़े कहीं

“हम” विलीन हुए “तुम” में “मैं” “तुम” जानो क्या कहीं ?

बस “तुम” जीते रहना “मुझमे”

या कहना ”हमने” किया “तुम्हें” याद कभी.. #निवेदिता

क़त्ले आम :

एक सेव को क़त्ल होते देख ख़याल आया:

“क़त्ल ए आम सुना था साहेब

ये क़त्ल ए सेब कबसे होने लगे “।

जवाब आया : जबसे आम खास और सेब आम होने लगे हैं ।। “निवेदिता” #Nivedita

चन्द्र प्रेम

वह चंद्र बिन “ज्योत्स्ना” के, ज्यों पथ बिना विकास,

वह दीप बिन अंधियार के, ज्यों दिनकर को प्रकास

वह ताल बिन झंकार के, ज्यों सरगम बिना राग,

वह ज्ञान बिना भक्ति के ,ज्यों तप बिन त्याग,

वह संगत बिन संतन के , ज्यों भोजन बिन साग,

वह मुक्ति बिन प्रभु आपके, ज्यों प्रीत बिना अनुराग।।

आज़ादी

आज “आज़ादी” के मायने को बदलते देख मेरा मन व्यथित हो गया , जो हमने पढ़ी और जो “आज़ादी” आज के नए नापाक इरादों से लेस देश को टुकड़ों में बाँटने पे लगीं हैं उन लोगों से मेरा यह क्रोधित कवि हृदय जो कहना चाह रहा है उसे पढ़ें ,अच्छा लगे तो जवाब ज़रूर दें। देश को सही दिशा में लेजाने का समय आज है अगर हर कोई यूँ ही मुँह उठाए “आज़ादी” चिल्लाने लगेगा तो कैसे होगा।

“आज़ादी” के दीवाने थे वो ,

जिन्हें नमन किए जाते हैं ,

“सिंह”सी दहाड़ लगाते थे,

ना गोली से कतराते थे,

देश की आन बचाने को,

कभी पीठ नहीं दिखाते थे,

हँस हँस कर फाँसी पे चढ़े,

“माइँ रंग दे बसंती ” गाते थे,

शुक्र है !जो वो आज रहे नहीं,

नहीं ,आज सहन कर पाते थे,

ये “आज़ादी” के “शूकर” हैं,

दुनिया से भगाए जाते है,

रंग “हरे” उस दुश्मन की,

ओढ़ ओढ़ चिल्लाते हैं,

नमक देश का खाते हैं,

राग दुश्मन का गाते हैं

चलो,

अब इन “आस्तीन के सांपो को”,

बाज़ुओं की हिम्मत दिखाते हैं ,

फेंको- फेंको चिल्ला रहे,

आओ इन्हें फेंक आते हैं ।। #निवेदिता #Nivedita