पत्थर दिल

कुछ लोग पत्थर के बने होते हैं
न जीवन से समझते हैं न मृत्यु से
बर्फ से ठंडे दिल और गर्म सलाखों सा दिमाग
न प्रेम से पिघलते हैं न प्यार से समझते हैं
कुछ लोग पत्थर के बने होते है

कुछ बातें या तो उनकी समझ के परे होते हैं
या समझकर भी ढोंग नासमझी का करते हैं
कठोर हृदय के और खोखल सा दिमाग
न समझाए समझते हैं न कहे का करते हैं
कुछ लोग शायद पत्थर के बने होते हैं।

ज्योत्सना “निवेदिता”

Human Nature

Every human being is different in nature
Some are creative, some enquisite and some  Indifferent.

The Indifferent ones are the cold ones,
Untouched by any surge of emotion,
Just like the solitary rock in the middle of the stream,
Staying cold as ever inspite of the repeated and gentle strokes of the streams.

The Indifferent ones are as cold as Rock,
Neither understanding the joy of life nor the sorrow of death,
The heart as icy as could be and head hot as molten lava,
Neither melting with compassion nor understandable with love.

Some thoughts are beyond their comprehension,
Or they just pretend to be an idiot,
Heart staying tough and mind hollow,
Neither they understand anything nor they do as said,
Really, the indifferent ones.

Jyotsna “Nivedita”

Long Distance Relationship

Only trust, honesty
Care and  loyality can
Keep the relationship alive
In a long distance relationship.
The feeling of separation
Overtakes the mind and
Can’t be erased just by
Meeting once or twice in a month
It takes a lot of effort
To remain together
All what is missed is
the presence the cuddles
Making love, hugs
kisses and the warmth
Of togetherness everyday…



रेशम के धागों में बुने हुए
किसी तांत की साड़ी में
समय की परतों में
सिमटी हुई “वो”
साड़ी की  सिलवटों  में
गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
बचपन से जवानी तक
उसका एक कली से फूल बनना
यौवन की अल्हड़ अठखेलियां
प्रेम में हंसना खिलखिलाना
और फिर प्रौढावस्था  तक
फूल के खिलने से बिखरने तक
कजरारी आंखों से ख्वाब झांकते रहे
उसके आंचल में पलते रहे
तब तक के जब तक तांत के तार
तार तार होकर फट न गए..  ज्योत्सना “निवेदिता”

Note: Tant sari is a traditional Bengali sari, originating from the Bengal region in the eastern part of the Indian subcontinent, and usually used by Bengali women.

The Poem is about a woman how she blooms from a bud to a flower and till she dies she keep dreaming and manages all the social formalities bound in relationships and social boundaries.


ये बादल मुझे क्यूं लुभाते हैं
बार बार अपनी ओर बुलाते हैं
और मैं खिंचती चली जाती हूं
चांद को छुपाकर सीने में
मुझसे बहुत दूर ले जाते हैं
कभी भागती हूं इनके पीछे
कभी थककर बैठ जाती हूं 
जानती हूं के वो भी इन्हें
मेरी ही तरह दूर से ताकते होंगे
इनमे बनती बिगड़ती आकृति में
कभी मुझे कभी मेरे चेहरे को ढूंढते होंगे
क्या ये बादल उन्हें भी लुभाते होंगे ?


कृष्ण ने पूछा अर्जुन से
हे पार्थ! ये तूने क्या किया
चतुरंगी सेना को छोड़
क्यों मेरा वरण किया
माखन तो दुर्योधन ले गया तूं मूढ़ खड़ा ही रह गया
हे अर्जुन! तूने क्या किया..

अर्जुन मंद मंद मुस्काये
कहे! माखन का क्या मोल
सखा! मैंने माखन चोर पा लिया
स्वामी,माया का मैं क्या करूँ
मुझे  मायापति ने अपना लिया भ्रात् को सेना लेने दो बस तुम मेरे साथ ही रहना..

हे नाथ!
मेरे रथ को आप हांक देना सारथी बन जीवन तार देना .. ज्योत्स्ना “निवेदिता”

धरती और अम्बर

मैं धरती वो अम्बर
वो रहते हैं शीर्ष गगन पर
मेरी नज़रें भी जहां नहीं पहुँचे
उनका मुक़ाम है इतना ऊपर

बस छूने की चाहत लिए मन में
मेघ सुस्ता रहे हैं उत्ताल शिखर में
एक आलिंगन हो धरा अम्बर का
हो मिलन हरितिमा और गगन का

नभ सींचे धारा को प्रेम की बूंदों से
हो संगम अप्रतिम किरणों से
बुझे प्यास मरू की आज जन्मों से
करें आधरामृत का पान धरा के “अधर” से

ज्योत्सना “निवेदिता”

*अधर – नीचा, निचला होंठ


Rivers and drains have become silent,
The birds are back to their nest,
The Sun is playing hide and seek,
Reflection of which can be seen in water

Evening is supine,
The red shade of memories have gone dark,
The sound of blowing Conch from the temples could be heard,
The flame of lamps have turned golden

The hoofs of returning cows create clouds of dust,
Everything adds to the vibrant vivid golden red shade of the sky,
The retreat of last rays of twilight announce the coming of night

The longing in the heart goes strong,
With the loud melodious horn of peacock,
Thoughts wander in the heart of the beloved,
For the passion and pain the Evening holds. Jyotsna “Nivedita”


मेरी यह कविता नॉर्थ ईस्ट के पहाड़ी इलाकों में भोर के समय का वर्णन है। चूंकि वहां सूर्योदय जल्दी हो जाता है तो जन जीवन भी उतनी ही जल्दी शुरू हो जाता है किस प्रकार एक ओर प्रकृति अपने सौंदर्य से ओतप्रोत होती है तो दूजा देवालयों में हो रही आरती अर्चना की आवाज गूंज रही होती है और इसी सब के बीच बाजार खुलने लगते हैं चाय समोसे की दुकान खुल जाती हैं और वहां से उठ रही वो महक किसी भी मनुष्य को ललचा दे।

सुबह जब हम सैर को निकलते तो वहां कोने में सीढ़ी पे बैठी वह बूढ़ी मां अद्रख कूटकर जैसे ही स्टोव चालू करती तो एक मीठी सी महक कदमों को वहीं रोक देती आगे चलकर वो समोसे वाले भैया गर्म गर्म समोसे भजिया तलकर रख रहे होते और जीपों की आवाजाही से टूरिस्टों का आना एक सुहानी और सुरंगी भोर का एहसास कराती।

इन्हीं भावों को कविता में उकेरा है मैंने आशा है आपको पसंद आएगी 🙏

ये उषा क्या बोलती है
कोयल सी कूकती है
पपिहे सी पीकती है
बुलबुल सी गुनगुनाती है
ये उषा रस घोलती है..

मंदिर में बजते घंट घड़ियाल सी
गूंजते श्लोक और खड़ताल सी 
मेरे कृष्ण की बांसुरी की ताल सी
कहीं गुरुमुख से की गई अरदास सी
ये उषा रस घोलती है…

दूधवाले के बर्तनों की ठानकर में
केरोसिन के स्टोव पे उबलती
कड़क चाय की भीनी सी महक में
गर्म समोसे से उठती लपट में
ये उषा रस घोलती..  ज्योत्सना “निवेदिता”