मन


मन बंजारा डोल रहा है
प्रेम शहद मद घोल रहा है
मीठी मीठी बातों से वो
ज़हर में मिश्री घोल रहा है

ना जाने क्यों रूष्ट हुआ है
मुझसे मुंह अब मोड़ लिया है
जाने अंजाने जो भी था वो
मन ने सब कुछ छोड़ दिया है


मन ही मन की बातें जाने
सुनना जाने  सुनाना जाने
मीठे कड़वे भेद ये जाने
हंसाना जाने रुलाना जाने 

दिल जाने दिमाग भी जाने
कहना जाने छुपाना जाने
यादों में जीना भी जाने
कभी यादों से भुलाना जाने
मन की बातें मन ही जाने।। ज्योत्सना #निवेदिता

विचार/ Thoughts

कभी कभी हमारे बोलने के तरीके में एक खास तरह की तीक्ष्णता होती है
हम जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ाइयाँ दिन में जीतते हैं उन्हें  रातों में सिर झुकाकर अन्धकार के हवाले कर देते हैं ।
दबी खामोशियाँ, दीवारों पर उदासी, हवा में शुष्कता,
खिड़की पर हताशा की आराम धूल साक्षी होती है उस संघर्ष की।
कभी कभी प्रतीत होता है कि इन ख़ोखल दीवारों में दबी
यादें भी सिसकियां भरती होंगी और सोचती होंगे ये क्या थे क्या हो गये। जानिये क्या सोचतीं होंगी वो दीवारें खिड़कियां और किवाड़ें जो गवाह हैं गए कल से आने वाले कल तक के..

वो चहक वो चमक कहां खो गईं कहां वो हंसी गुम हुई
क्यों उदासीन है यह कमरा क्यों खामोश वो हो गई
जो थकती न थी कहते चहकते क्यों वो आज चुप हो गई
अब आप चाहें तब तक चुपचाप सुनें उसकी चुप्पी गूंजती है
दिखावे को वो दिन भर मुस्कुराती रातों को सिसकती है। ज्योत्सना “निवेदिता”

अकेली

कैसे हैं आप?
यह भी जानती हूं मेरे ऐसा कहने और करने की कोई आवश्यक्ता भी नहीं और न ही आपको कोई फर्क पड़ेगा  फिर भी पूछना मेरी आदत बन गई है और मजबूरी भी। न जवाब का इंतजार न उम्मीद, बस पूछ लेना मेरी विवशता है क्यूंकि जानती हूं जैसे भी होंगे ठीक ही होंगे क्योंकि मेरी प्रार्थनाएं आपके साथ हैं।

मैंने कहां यह कहा कि मुझे चांद सितारे चाहिए मैंने तो बस एक हामी मांगी,इत्ती सी- वो भी उतनी ही जो यह बता दे कि आप कुशल हैं और इससे ज्यादा कुछ भी तो नहीं। खैरियत चाहना अगर गुनाह है तो हां हूं मैं गुनहगार ऐसा कहते कहते वो रोने लगी।

आईना में से झांक रहा वो कुछ कहना चाहता था और कहने को मुंह खोला ही था कि रचना मुड़कर दुपट्टे से मुंह ढककर रोने लगी और रोते रोते बोली कितनी अकेली रह गई हूं मैं! क्यों तुम नहीं हो मेरे पास और क्यों मेरी जरूरत तुम्हें नहीं।

सब साथ छोड़ दें तब
जब वक्त साथ दे नहीं
सभी व्यस्त अतिव्यस्त
एक मैं ही रही अकेली

न पूछो कहां थे न पूछो
कौन आए थे न पूछो
वो वस्त हैं अतिव्यस्त
एक मैं ही रही अकेली

किसी ने भी नहीं चाहा
किसी से भी न ज्यादा
रहे सब में व्यस्त अतिव्यस्त
एक मैं ही रही अकेली..

ज्योत्सना “निवेदिता”

Ps: एक विरहणी की मनोदशा जो प्रेम में डूबी हुई अपने प्रेमी के आने की बाट जो रही है और खैरियत चाह रही है। वहां से कोई जवाब ना आने पर व्यथित हो जाती है और स्वयं को दुनिया से अलग थलग पा रही है।

तांत

रेशम के धागों में बुने हुए
किसी तांत की साड़ी में
समय की परतों में
सिमटी हुई “वो”
साड़ी की  सिलवटों  में
गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
बचपन से जवानी तक
उसका एक कली से फूल बनना
यौवन की अल्हड़ अठखेलियां
प्रेम में हंसना खिलखिलाना
और फिर प्रौढावस्था  तक
फूल के खिलने से बिखरने तक
कजरारी आंखों से ख्वाब झांकते रहे
उसके आंचल में पलते रहे
तब तक के जब तक तांत के तार
तार तार होकर फट न गए..  ज्योत्सना “निवेदिता”

Note: Tant sari is a traditional Bengali sari, originating from the Bengal region in the eastern part of the Indian subcontinent, and usually used by Bengali women.

The Poem is about a woman how she blooms from a bud to a flower and till she dies she keep dreaming and manages all the social formalities bound in relationships and social boundaries.

बादल

ये बादल मुझे क्यूं लुभाते हैं
बार बार अपनी ओर बुलाते हैं
और मैं खिंचती चली जाती हूं
चांद को छुपाकर सीने में
मुझसे बहुत दूर ले जाते हैं
कभी भागती हूं इनके पीछे
कभी थककर बैठ जाती हूं 
जानती हूं के वो भी इन्हें
मेरी ही तरह दूर से ताकते होंगे
इनमे बनती बिगड़ती आकृति में
कभी मुझे कभी मेरे चेहरे को ढूंढते होंगे
क्या ये बादल उन्हें भी लुभाते होंगे ?
Jyotsna”निवेदिता”

धरती और अम्बर

मैं धरती वो अम्बर
वो रहते हैं शीर्ष गगन पर
मेरी नज़रें भी जहां नहीं पहुँचे
उनका मुक़ाम है इतना ऊपर

बस छूने की चाहत लिए मन में
मेघ सुस्ता रहे हैं उत्ताल शिखर में
एक आलिंगन हो धरा अम्बर का
हो मिलन हरितिमा और गगन का

नभ सींचे धारा को प्रेम की बूंदों से
हो संगम अप्रतिम किरणों से
बुझे प्यास मरू की आज जन्मों से
करें आधरामृत का पान धरा के “अधर” से

ज्योत्सना “निवेदिता”

*अधर – नीचा, निचला होंठ

उषा

मेरी यह कविता नॉर्थ ईस्ट के पहाड़ी इलाकों में भोर के समय का वर्णन है। चूंकि वहां सूर्योदय जल्दी हो जाता है तो जन जीवन भी उतनी ही जल्दी शुरू हो जाता है किस प्रकार एक ओर प्रकृति अपने सौंदर्य से ओतप्रोत होती है तो दूजा देवालयों में हो रही आरती अर्चना की आवाज गूंज रही होती है और इसी सब के बीच बाजार खुलने लगते हैं चाय समोसे की दुकान खुल जाती हैं और वहां से उठ रही वो महक किसी भी मनुष्य को ललचा दे।

सुबह जब हम सैर को निकलते तो वहां कोने में सीढ़ी पे बैठी वह बूढ़ी मां अद्रख कूटकर जैसे ही स्टोव चालू करती तो एक मीठी सी महक कदमों को वहीं रोक देती आगे चलकर वो समोसे वाले भैया गर्म गर्म समोसे भजिया तलकर रख रहे होते और जीपों की आवाजाही से टूरिस्टों का आना एक सुहानी और सुरंगी भोर का एहसास कराती।

इन्हीं भावों को कविता में उकेरा है मैंने आशा है आपको पसंद आएगी 🙏

ये उषा क्या बोलती है
कोयल सी कूकती है
पपिहे सी पीकती है
बुलबुल सी गुनगुनाती है
ये उषा रस घोलती है..

मंदिर में बजते घंट घड़ियाल सी
गूंजते श्लोक और खड़ताल सी 
मेरे कृष्ण की बांसुरी की ताल सी
कहीं गुरुमुख से की गई अरदास सी
ये उषा रस घोलती है…

दूधवाले के बर्तनों की ठानकर में
केरोसिन के स्टोव पे उबलती
कड़क चाय की भीनी सी महक में
गर्म समोसे से उठती लपट में
ये उषा रस घोलती..  ज्योत्सना “निवेदिता”

क्या तुम जाग रहे हो?

क्या तुम जाग रहे हो

मेरे नयनों में स्वप्न बन

जगते हुए जगमगा रहे हो

मेरी अनकही बातों को

क्या सुनपा रहे हो

नहीं आती हूँ अब तुम्हें सताने

पर क्या तुम मुझे

सताए बिना रह पा रहे हो

तुम्हें विधाता ने मेरे लिए

चुनकर बुनकर भेजा है

ठीक उस झमझमाती हुई

बारिश की तरह

जो आती तो बहुत तेज़ है

पर उसी तेज़ी से धीमी हो

चली जाती है

फिर भी मैं मेरे भीगे हुए “मन”

को निचोड़कर उन यादों को

संजोये बैठी हूँ

क्या तुम्हें भी मेरी याद आरही है

बोलो क्या मैंने भी तुम्हारी तरह

तुम्हारे ह्रदय मेंअपने लिए

एक कुटीया बना ली है.. ज्योत्सना “निवेदिता”