उषा

मेरी यह कविता नॉर्थ ईस्ट के पहाड़ी इलाकों में भोर के समय का वर्णन है। चूंकि वहां सूर्योदय जल्दी हो जाता है तो जन जीवन भी उतनी ही जल्दी शुरू हो जाता है किस प्रकार एक ओर प्रकृति अपने सौंदर्य से ओतप्रोत होती है तो दूजा देवालयों में हो रही आरती अर्चना की आवाज गूंज रही होती है और इसी सब के बीच बाजार खुलने लगते हैं चाय समोसे की दुकान खुल जाती हैं और वहां से उठ रही वो महक किसी भी मनुष्य को ललचा दे।

सुबह जब हम सैर को निकलते तो वहां कोने में सीढ़ी पे बैठी वह बूढ़ी मां अद्रख कूटकर जैसे ही स्टोव चालू करती तो एक मीठी सी महक कदमों को वहीं रोक देती आगे चलकर वो समोसे वाले भैया गर्म गर्म समोसे भजिया तलकर रख रहे होते और जीपों की आवाजाही से टूरिस्टों का आना एक सुहानी और सुरंगी भोर का एहसास कराती।

इन्हीं भावों को कविता में उकेरा है मैंने आशा है आपको पसंद आएगी 🙏

ये उषा क्या बोलती है
कोयल सी कूकती है
पपिहे सी पीकती है
बुलबुल सी गुनगुनाती है
ये उषा रस घोलती है..

मंदिर में बजते घंट घड़ियाल सी
गूंजते श्लोक और खड़ताल सी 
मेरे कृष्ण की बांसुरी की ताल सी
कहीं गुरुमुख से की गई अरदास सी
ये उषा रस घोलती है…

दूधवाले के बर्तनों की ठानकर में
केरोसिन के स्टोव पे उबलती
कड़क चाय की भीनी सी महक में
गर्म समोसे से उठती लपट में
ये उषा रस घोलती..  ज्योत्सना “निवेदिता”

क्या तुम जाग रहे हो?

क्या तुम जाग रहे हो

मेरे नयनों में स्वप्न बन

जगते हुए जगमगा रहे हो

मेरी अनकही बातों को

क्या सुनपा रहे हो

नहीं आती हूँ अब तुम्हें सताने

पर क्या तुम मुझे

सताए बिना रह पा रहे हो

तुम्हें विधाता ने मेरे लिए

चुनकर बुनकर भेजा है

ठीक उस झमझमाती हुई

बारिश की तरह

जो आती तो बहुत तेज़ है

पर उसी तेज़ी से धीमी हो

चली जाती है

फिर भी मैं मेरे भीगे हुए “मन”

को निचोड़कर उन यादों को

संजोये बैठी हूँ

क्या तुम्हें भी मेरी याद आरही है

बोलो क्या मैंने भी तुम्हारी तरह

तुम्हारे ह्रदय मेंअपने लिए

एक कुटीया बना ली है.. ज्योत्सना “निवेदिता”