विचार/ Thoughts

कभी कभी हमारे बोलने के तरीके में एक खास तरह की तीक्ष्णता होती है
हम जो अपने आत्मसम्मान के लिए लड़ाइयाँ दिन में जीतते हैं उन्हें  रातों में सिर झुकाकर अन्धकार के हवाले कर देते हैं ।
दबी खामोशियाँ, दीवारों पर उदासी, हवा में शुष्कता,
खिड़की पर हताशा की आराम धूल साक्षी होती है उस संघर्ष की।
कभी कभी प्रतीत होता है कि इन ख़ोखल दीवारों में दबी
यादें भी सिसकियां भरती होंगी और सोचती होंगे ये क्या थे क्या हो गये। जानिये क्या सोचतीं होंगी वो दीवारें खिड़कियां और किवाड़ें जो गवाह हैं गए कल से आने वाले कल तक के..

वो चहक वो चमक कहां खो गईं कहां वो हंसी गुम हुई
क्यों उदासीन है यह कमरा क्यों खामोश वो हो गई
जो थकती न थी कहते चहकते क्यों वो आज चुप हो गई
अब आप चाहें तब तक चुपचाप सुनें उसकी चुप्पी गूंजती है
दिखावे को वो दिन भर मुस्कुराती रातों को सिसकती है। ज्योत्सना “निवेदिता”

5 thoughts on “विचार/ Thoughts

  1. Wow, this highlighted a stark contrast between the mood in the day vs the mood of the same person at night. This was a terrific concept and read marvelously. It was a little bit tricky for me to translate at first since the kept getting a “Text exceeds 3900 character limit” error (I use google translate 🤣🤣) but worth every effort haha

    Liked by 1 person

      1. Hahaha yeah translations on google can be tricky; what looked like just a few lines of Hindi, translates to be about 10-times as much in English — I am always impressed by that 😂😂

        Thanks so much for setting me straight with the correct context of your writing lol

        Like

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