धरती और अम्बर

मैं धरती वो अम्बर
वो रहते हैं शीर्ष गगन पर
मेरी नज़रें भी जहां नहीं पहुँचे
उनका मुक़ाम है इतना ऊपर

बस छूने की चाहत लिए मन में
मेघ सुस्ता रहे हैं उत्ताल शिखर में
एक आलिंगन हो धरा अम्बर का
हो मिलन हरितिमा और गगन का

नभ सींचे धारा को प्रेम की बूंदों से
हो संगम अप्रतिम किरणों से
बुझे प्यास मरू की आज जन्मों से
करें आधरामृत का पान धरा के “अधर” से

ज्योत्सना “निवेदिता”

*अधर – नीचा, निचला होंठ

Evening

Rivers and drains have become silent,
The birds are back to their nest,
The Sun is playing hide and seek,
Reflection of which can be seen in water

Evening is supine,
The red shade of memories have gone dark,
The sound of blowing Conch from the temples could be heard,
The flame of lamps have turned golden

The hoofs of returning cows create clouds of dust,
Everything adds to the vibrant vivid golden red shade of the sky,
The retreat of last rays of twilight announce the coming of night

The longing in the heart goes strong,
With the loud melodious horn of peacock,
Thoughts wander in the heart of the beloved,
For the passion and pain the Evening holds. Jyotsna “Nivedita”

उषा

मेरी यह कविता नॉर्थ ईस्ट के पहाड़ी इलाकों में भोर के समय का वर्णन है। चूंकि वहां सूर्योदय जल्दी हो जाता है तो जन जीवन भी उतनी ही जल्दी शुरू हो जाता है किस प्रकार एक ओर प्रकृति अपने सौंदर्य से ओतप्रोत होती है तो दूजा देवालयों में हो रही आरती अर्चना की आवाज गूंज रही होती है और इसी सब के बीच बाजार खुलने लगते हैं चाय समोसे की दुकान खुल जाती हैं और वहां से उठ रही वो महक किसी भी मनुष्य को ललचा दे।

सुबह जब हम सैर को निकलते तो वहां कोने में सीढ़ी पे बैठी वह बूढ़ी मां अद्रख कूटकर जैसे ही स्टोव चालू करती तो एक मीठी सी महक कदमों को वहीं रोक देती आगे चलकर वो समोसे वाले भैया गर्म गर्म समोसे भजिया तलकर रख रहे होते और जीपों की आवाजाही से टूरिस्टों का आना एक सुहानी और सुरंगी भोर का एहसास कराती।

इन्हीं भावों को कविता में उकेरा है मैंने आशा है आपको पसंद आएगी 🙏

ये उषा क्या बोलती है
कोयल सी कूकती है
पपिहे सी पीकती है
बुलबुल सी गुनगुनाती है
ये उषा रस घोलती है..

मंदिर में बजते घंट घड़ियाल सी
गूंजते श्लोक और खड़ताल सी 
मेरे कृष्ण की बांसुरी की ताल सी
कहीं गुरुमुख से की गई अरदास सी
ये उषा रस घोलती है…

दूधवाले के बर्तनों की ठानकर में
केरोसिन के स्टोव पे उबलती
कड़क चाय की भीनी सी महक में
गर्म समोसे से उठती लपट में
ये उषा रस घोलती..  ज्योत्सना “निवेदिता”

संध्या

नदिया नाले थम गए हैं
नीड़ को पंछी लौट रहे है
खेल रहा है सूरज लुकछिप
जल में छाया उसका प्रतिबिंब

अलसायी सी है दुपहरी
यादों की अरूणाई गहरी
शंख नाद मंदिर में होते
ज्योत जल रही है सुनहरी

गौधुली में उड़ती गोरज
बिखेर रही है आभा स्वर्णिम
ढलती सूर्य की किरणें अंतिम
हो रही रात्रि को प्रेरित

हूक उठती रह रहकर हृदय में
मोर पिकता पंचम स्वर में
सोच रही विरहणी मन में
ये कैसी सांझ आई जीवन में.. ज्योत्सना “निवेदिता”

Painted by me #watercolour