पशोपेश

कैसे पशोपेश में फसें हम,
खुद ही खुद से डरे हम,
इंसान तो हर ओर जीवित है,
किन्तु इंसानियत हुई क्षीर्ण है,
बनते अच्छाई के पुतले हम,
परछाई से भी भयभीत हम।
असल और नकल में उलझे,
जाने क्या सोच रहे हैं हम,
शंकित हर किसी पे हम,
एक अदृश्य हथियार से,
जाने वाले को देखते रहे,
जड़ ठूंठ बने खड़े हम,
पल भर को मुझपर भी,
इस विचार का छाया तम,
अगले ही क्षण छँट गया,
फिर उजला हुआ यह मन,
सत्य है नहीं होंगे परास्त हम,
लड़ेंगे और होंगे विजयी हम,
डरो नहीं घबराओ नहीं,
हैं हिन्द के निवासी हैं अजय हम..
©ज्योत्स्ना “निवेदिता”

Life

Keep your eyes open,
To see the wonders of Life..

Keep your ears open,
To hear the music of Life..

Keep your heart open,
To experience the love in Life..

Keep your mind open,
To create magic in Life..

Keep your Arms Open, To hug the happiness of Life..

Life

बचपन

नन्हीं सी आशाऐं मेरी,

नन्ही सी मेरी चाहत हैं।

न रूठने का कारण कोई,


पर हंसने के बहाने अंनत हैं।

न उठने की जल्दी कोई,


न दफ्तर जाने की जल्दी है।


दीदी असली बन कर घूमूं,


लेकिन छोटा भाई नकली है ।

अंक गणित के तारों में देखूं,


लेकिन सपनों में चंदा मामा हैं।

दादी के किस्से कहानियों में


परीलोक की स्वप्निल परियां हैं|

खिलौनों का ये अंबार लगा है


मेरी खुशियों का यह खजाना है।

नन्हा सा यह बचपन मेरा  नित


नव भविष्य का स्वप्न संजोता है। 

©ज्योत्स्ना “निवेदिता”