पान

भैया एक मीठा पान बना दो..
कत्था ज़रा सा उसके होंठों की प्याली सी,
ज़रा सा चूना उसके गालों की लाली सी,
खुशबू उसके उलझे बालों की बाली सी,
इलाइची हीरा मोती सब उसके वाली सी,
चबाउं तो लगे मेरी जान है नखरेवाली सी,
चढ़े मुझे नशा उसकी आँखों की प्याली सी,
चबाया पान समझकर अपनी जान मतवाली सी,
जीभ काट गई , ये तो लगी मुझे गाली सी,
जान काफूर निकली कड़वी ज़हर की प्याली सी, ©ज्योत्स्ना “निवेदिता”

भँवर

यूँ उनसे प्रीत की रीत मैने कब जोड़ी याद नहीं,

टूटी कैसे वो भुलाये भूलती नहीं है,

आज मन फट सा गया अपनी तारीफें पढ़कर

की अब लेखनी कतई लुभाती नहीं है।

वो गुस्सा नहीं ईर्ष्या थी जो सताती रही,

डर था तूँ उनकी ओर खींचता जाता रहा,

दूरियां जब बर्दाश्त न हुई तो कचोटती रही,

पर नादान तेरा दिल उसे समझा ही नहीं।

दुख नहीं कि मुझे मेरे ग़लती की सज़ा मिली,

गलतियां करती ही थी तुझसे सुधरवाने के लिए,

चरित्रहीन तो नहीं थी जो आज वो उपाधी मिली,

रोष के “भँवर” में फँसी तेरे प्यार में मेरी न चली।

©ज्योत्स्ना “निवेदिता”

यादें

ये यादें भी न बहुत अजीब होती हैं
तस्वीरें खुशियों की रसीद होती हैं
पलटते हुए कभी लगता ही नहीं
तस्वीरों को भी तकलीफ होती हैं
वो खिलखिलाती मुस्कुराती मैं
मानो वो आंखे कभी रोई ही नहीं हैं।। #निवेदिता
©ज्योत्स्ना