चहरे

कोफ्त होती है उन हसिनाओं से,
जो फँसा लेती हैं सबको प्यार से,
ज़माना तो ज़माना है हमसे तो वो,
“साहेब”ही रहते हैं हरवक्त नाराज़ से।

होड़ ‘मुखोटों’ की लगी देखो बड़ी शान से,
लड़ी तब भी मैं बचाने उन्हे झूठे अभिमान से,
नकली चहरे पे चहरे ही पसन्द हों उन्हें जैसे,
सारे सच धरे के धरे रहे उन्हें नागवार से।

Picture Via Google
एक बुरो प्रेम को पंथ , बुरो जंगल में बासो
बुरी नारी से नेह बुरो , बुरो मूरख में हँसो
बुरी नारी कुलक्ष , सास घर बुरो जमाई। “कवि गंग

कोई ढोंग बेचारी का रोना रोने से,
कोई बहलाकर ज़हरीली मुस्कान से,
फुसला लेती हैं, अपने तीन पाँच से,
मैं लड़ती रही खुद ही, खुद के पहचान से। ©ज्योत्स्ना “निवेदिता”

4 thoughts on “चहरे

  1. BAhut hi khubsurat rachna……aaj logon ko pahchanna mushkil…….asli kaun ….kaun nakli samjhna mushkil.

    jhuthi shaan kis kaam ki…….ek din ujagar ho jaayegi……..jo hai wahi dikhawo…..saari umra rah jaayegi.

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