समय (मौन मुस्कान की मार)

“समय समय की बात है ”

“चारु चंद्र को चंचल किरणें”

वे पढ़ते थे जब वे बच्चे थे, हमने भी पढ़ी आज भी पढ़ते होंगे, समय बस इतना बदला है कि साइकल ने हमारे समय में लूना ने ली और आज बाइक्स ने ले ली । लड़ते हुए बच्चे अब भी हैं, चंद्र वही, चंचलता वही, मौन वही बस हम और हमारा आज अलग ..

P.S.: “अपनी बात” पुस्तक “मौन मुस्कान की मार” लेखक श्री “आशुतोष राणा” से प्रेरित मेरे अपने विचार, निवेदित “निवेदिता”

No NOTA

NOTA क्यूँ नहीं ज़रा पढ़ें और सभी बंधु बँधवों को भी पढ़ायें : ज़रूरी है जानना । वोट अपने मन से करें पर करें जरूर NOTA पे व्यर्थ ना करें 🙏

@bhaatdaal #nivedita

“हम”- “तुम”

सुनो जो तुम हो वो “मैं” में जीते आए हो,

और “मैं” “ज़हीन” ही सही,पर “हम” में ही यहीं “कहीं”,

ढूँढोगे तो पाओगे “मैं”को “हम” में यहीं कहीं ..

कितने ओछे हो क़द में, चाहे पद में ऊँचे खड़े कहीं

“हम” विलीन हुए “तुम” में “मैं” “तुम” जानो क्या कहीं ?

बस “तुम” जीते रहना “मुझमे”

या कहना ”हमने” किया “तुम्हें” याद कभी.. #निवेदिता

क़त्ले आम :

एक सेव को क़त्ल होते देख ख़याल आया:

“क़त्ल ए आम सुना था साहेब

ये क़त्ल ए सेब कबसे होने लगे “।

जवाब आया : जबसे आम खास और सेब आम होने लगे हैं ।। “निवेदिता” #Nivedita