लड्डू

काश! के ऐसा कोई यंत्र होता,

तो शायद ना मेरा मन यूँ रोता,

कहाँ वो समय मेरा खो गया,

मेरा बचपन यूँ बड़ा हो गया ।।

यूँ तोतली बोली में कहता,

भुआ मैं निर्मल जल हूँ बहता,

निरंतर चिरंतर बहता ही रहता,

भुआ को वो सारी कहानियाँ कहता,

भुआ का समय ज़रा कड़ा जो हुआ,

मेरा लड्डू अब बड़ा हो गया..

ले अभी दादा को कहती हूँ,

बदमाशियाँ जो तू हैं करता,

ना दादा से ना पापा से कहना,

मैं देखो कितना सयाना हो गया,

मेरा नन्हा सा लड्डू बड़ा हो गया,

सहसा ही मुझको एहसास हो गया,

वो मेरा लड्डू बड़ा हो गया ।।

भुआ का आँगन जो अब उसने छोड़ा,

लड़कपन के प्रांगण में यूँ भाग दौड़ा,

अचम्भितहूँ मैं, एक क्षण ना छोड़ा,

सहसा ही मेरा दाऊ बलराम हो गया,

छोटा सा नन्हा मेरा लड्डू बड़ा हो गया ।।#निवेदिता