नफ़रत /प्रेम

पूछती हूँ ख़ुद से हर बार – सब से बार बार ,

प्रेम में नफ़रत नफ़रत से प्रेम ,क्यूँ है इतनी असरदार ?

ऐसा क्यों लगता है कि नफरत इतनी बड़ी है?

प्रेम से बढ़कर नफरत बहुत मजबूती से खड़ी है ।

कुछ भी समान नहीं हो सकता है जो कि सच्चा है,

नफरत का भार सहने को मेरा हृदय अभी बच्चा है ,

ऐसा लगता है कि प्यार हवा की तुलना में हल्का है,

नफरत के खाते में नज़र डालें बस आँखों से छलका है।

प्यार वाहक को उसके मान को मजबूत करता है ,

इसलिए किसी को अपना वजन नहीं लगता है ,

आप जल्द ही सीखते हैं कि प्यार का घनत्व कितना है,

जबकि बड़े पैमाने पर नफरत का ढेर तराज़ू पे लगता है ।

आप समझते ही नहीं कि प्रेम धीरज है , दयालु है,

मक्खन है , खोखला नहीं , कठोर नहीं नर्म है

क्यूँ अपने आप को नहीं टटोलते ?क्यूँ नहीं ढूँढते है,

क्रोध और नफ़रत में डूबे बस बुराई ही सोचते है। “निवेदिता”

9 thoughts on “नफ़रत /प्रेम

  1. अगर प्रेम है तो नफरत हो नही सकता। और अगर नफरत प्रेम के बावजूत भी किसी मोड़ में हो गयी तो प्रेम हुआ ही नही था। इसलिए प्रेम और नफरत सिक्के तो दो विपरीत पहलू है।

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    1. वीरजी आपने अकाउंट बनाकर प्रतिक्रिया दी और और मुझे प्रोत्साहित किया है इसके लिए आपको सादर प्रणाम और धन्यवाद 🙏 मैं अपनी ख़ुशी शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती ।

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  2. अच्छी कविता है. मेरा खयाल ये है की इतनी छोटी जिंदगी प्यार के लिए ही काफी नही कौन कमब्खत उसे नफरत मे खर्च करता है

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    1. हर्ष आपका बहुत बहुत आभार । आपके विचार बहुत महत्वपूर्ण हैं क्यूँकि जब सराहना एक अच्छे लेखक से मिलती है तो उससे बड़ी ख़ुशी की बात कुछ हो ही नहीं सकती । आपका धन्यवाद 🙏🙏

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