ज़िंदगी

ज़िंदगी के थपेड़ों ने ,

ऐसा घायल कर दिया ,

दर्द से पीड़ित ,तड़प रही

ऐसा झँझोड़ा ज़िंदगी ने ।

न वक़्त देखा ना जगह ,

बेदर्द ज़माना हंस रहा ,

बात बात पे चिढ़ जाती हूँ ,

ऐसा चिढ़ाया ज़िंदगी ने ।

आँसू थमने का नाम न लेते

रो रो के हाल बुरा हो गया

रोना अब स्वभाव हो गया ,

ऐसा रुलाया है ज़िंदगी ने ।

खोया हार बार खोया है ,

पाने का कहीं नाम नहीं ,

लड़ते लड़ते थक गई 

खुद को ही खोया ज़िंदगी में ।.. “निवेदिता ” 

13 thoughts on “ज़िंदगी

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