वफ़ा

पहले तो तेरे काँधे पे ,

सिर रख लेता था ,

जब ज़माने से ,

लड़ लेता था ,

तब तूँ वफ़ा की ,

रस्में निभाती थी ,

और मैं तुझे

बाहों में बाँध लेता था ।

अब तूँ तो नहीं ,

पर तेरी यादें,

हर लम्हा आती है ,

करवटों में रातें ,

गुज़र जाती है ,

नींद तो आती नहीं,

सपनो में तूँ फिर भी ,

खुलेआम सताती है ।

ना मैं भूल पाया ,

ना तूँने मनाया ,

जीने को बचा है

बस ग़मों का साया

माना के मैं ग़लत हूँ ,

पर ग़लती क्या थी?

वो तो बताके जाती।

ख़ैर !

समझाता हूँ दिल को ,

कि क्यूँ नाराज़ होना ,

और इंतज़ार करना ,

जनता है तूँ भी ,

के बेवफ़ा नहीं वो ,

मान जा ऐ दिल ,

बेकार है जिद्ध करना ,

उनसे वफ़ा की ,

उम्मीद करना .. #निवेदिता

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31 thoughts on “वफ़ा

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