तुमने

वो हूँ ,जिसे समझा नहीं तुमने,

मैंने माना ,जिसे माना नहीं तुमने,

तू भगवान है मेरा ,

मुझे दास भी माना नहीं तुमने,

मेरा जीवन तुझसे ये मैंने माना,

तन-मन से अपनाया,

बसाया आत्मा में तुमको मैंने

एक पल भी मुझे अपना बनाया नहीं तुमने …

स्वप्न बुने मैंने जो मात्र मेरे ही थे ,

नहीं कोई सरोकार है तेरा ,

मुझे “मानव”से निवेदिता बनाया भी तुमने,

नहीं इज़्ज़त कोई मेरी जबसे बताया है तुमने ..

टूट गए वो स्वप्न बिखर गए,

जिन्हें कभी दिखाया भी था तुमने..

जीवन मैं एक स्वाभिमान ही था मेरा,

गर्व इज़्ज़त से कमाया , था ऐसा अभिमान,

शायद अहम था जिसे मिटाया भी तुमने..

आज ना देने को बचा ना खोने को,

ना जीने को ना हँसने को ..

रो रो के जीना , सिखाया भी तुमने .. “निवेदिता”

14 responses to “तुमने”

  1. कृष्ण समर्पण की अनोखी मिसाल हैं आप।

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  2. That’s Your Beauty. Good Noon.

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    1. I am obliged 🙂 Thank you for your beautiful words

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  3. Bahut accha kavita likha hai aapne,,
    Heart releted hai ye kavita…..

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    1. शुक्रिया आपका पढ़नेका और सराहने का । उम्र में कहिन छोटे हैं मुझसे पर लेखनी में कहिन बड़े । मैंने आपकी कृतियों को पढ़ा है बहुत ख़ूब लिखते हैं समय मिलने पर एक एक कृति पर अपने भाव प्रकट करूँगी ।

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      1. Thanks
        Thank u very much
        Bas aap sabhi ka pyar or bless jab tak
        Mere sath hai
        Mai likhta rahunga

        But aap bhi bahut accha likhti hai..
        Aap sabhi ke in kavitaon se mujhe bahut kuchh sikhne ko milega….

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  4. sarahniy kavita …..umda lekhan….
    मेरा जीवन तुझसे ये मैंने माना,
    तन-मन से अपनाया,
    बसाया आत्मा में तुमको मैंने
    एक पल भी मुझे अपना बनाया नहीं तुमने …

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद आपके प्रोत्साहित करने वाले इन शब्दों से और लिखने की हिम्मत मिलती है

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      1. bahut badhiya likha hai….likhte rahiye.

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        1. 😊🙃🙂Aap aatei rahiye

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  5. इतना समर्पण. कविता अच्छी लगी

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    1. आभार है आपका और सादर धन्यवाद भी । आप आए पढ़ा और सराहा । इससे मेर मनोबल बढ़ गया है ।

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