पेट 

आज आखिरी होगा , 

सब आखिरी ..

पता नहीं मुझे ,

जाने अब और ,

आगे क्या होगा ?
“बस” , अब और नहीं । 
असहनीय है मेरे लिए ,
नाद शक्ति मेरी बंद हो 
डर है कि कष्टों के भंवर में ,

फंस जायेगा कोई । ..,
वो खेल यूँ ही ,

भावनाओं से खेलेगा ,
थकता नहीं रुकता नहीं 
वह मनुष्य है , 
बस भागता ही रहेगा ,
लगा है उसके एक पेट ,
जिसे पेट को पेट नहीं ,

तम्बूर माना है ,
जो कभी वो ,

भर नहीं पायेगा,…
खाने को जीना नहीं ,
बस जीने को खाना है ,
यह कभी .. 
वह समझ नहीं पाएगा ।।.. ” निवेदिता “

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4 thoughts on “पेट 

  1. खाने को जीना नहीं ,
    बस जीने को खाना है ,
    यह कभी ..
    वह समझ नहीं पाएगा ।।.
    BAHUT HI KHUBSURATI SE LIKHA HAI…..BAHUT KHUB.

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