मत बाँध मुझे …

मत बाँधो मुझे कड़ियों में..

साँस मिली है जीने को , 

जी लेने दो पल दो पल आज़ादी के ,

इन फूलों में मुझे रहने दो ..


मत बाँधो मुझे बेड़ियों में ,

रंग मिले हैं मुझे रंग भरने को ..

सादे बेरंग फूलों को ,

मनमोहक , सुंदर बनाने को ..


मत बाँधो मुझे इन ज़ंजीरों में,

पर (पंख) मिले हैं मुझे उड़ने को ,

तो क्या मुँह खोले बैठें हैं वो ,

तुरंत मुझे निगलने को … ” निवेदिता”