चाह नयी 

हज़ारों वर्षों से जमी बर्फ़ सी ,

कठोर अवस्र्द्ध मेरा हृदय ,

मन मस्तिष्क के साथ ,

जमी हुईं सी हड्डियां भी ..

किंतु धमनियों के भीतर,

बहता ख़ून अब भी गर्म है ,

जड़ीकृत शिरा में दौड़ती ,

रवानी महसूस करा रही है ,

खोखल शरीर ,ख़ुश्क त्वचा ,

में मानो प्रकाश पुंज अब भी,

पूर्ण जीवंत – खिलने को है ।

लेकिन छाया में कहीं छिप गए,

आत्ममता में उल्लिखित,

मेरे दिल के अंदर वो भाव फिर,

उग आए हैं , बढ़ने -फूलने को हैं,

बंजर ज़मीन में वो सफ़ेद फूल ,

सूखे ठूँठ की रूँख में नन्ही क़ोंपल

मानो नई कलियाँ खिलने को हैं 

बाग़ीचा फिरसे महकने को है । “निवेदिता”


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27 thoughts on “चाह नयी 

      1. I also want you to write again, be yourself again, that’s why I re read your blogs, felt the mesmerizing magic once again and wish some fresh magic to be spelled out of your pen.

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  1. खोखल शरीर ,ख़ुश्क त्वचा ,

    में मानो प्रकाश पुंज अब भी,

    पूर्ण जीवंत – खिलने को है ।
    kya khub likha hai…….jindagi shayad esi kaa naam hai…..
    kabhi man kahta hai….bas ab nahi…….
    phir koyee hawa ka jhonka aata hai purani yaadon ko patte ke saman uda le jaata hai aur nayee patton ka srijan kar mushkurane par bibas kar deta hai.

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  2. पहाड़ की खूसूरत वादियों में पैदा हो बड़े हुए ही,
    ऐसा वर्णन कर सकते हैं ज्योत्सनाजी.
    वाकई बहुत खूब लिखा आपने…

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