छलिया

छलिया

मैं मीरा बन तड़प रही ,

वो गोपियों संग रचाए रास,

दूर बसी क्यूँ मीरा भाए ?

जब रहते राधा के पास ;

 मैं प्रेम में जोगन बनी , 

उनके मन को गोपी ही भाए ।

 मैं उनका नाम रटते नहीं थकती , 

उनको मेरा नाम नहीं भाए । 

पूजूँ नित प्रातःनिशि मध्याह्न , 

पर कान्हा तो रहा छलिया

सिर्फ़ दूसरों का ही रहता ध्यान ।। 

“निवेदिता”..

Advertisements

38 thoughts on “छलिया

      1. सभी रचनाएं एक समान नही होती।कमी तो चाँद में भी है।सभी रचनाएं अपने आप मे पूर्ण होती हैं साथ ही बहुत अच्छी रचनाएं भी देखा जाए तो अपूर्ण हो सकती है।अतः आपका ये रचना बहुत अच्छा है।

        Liked by 1 person

  1. waah bahut khoob bhakti ras se sarabor hai ye kavita

    ugene paanv kabhi niklo to jaano. Makhmali fars par #garmi ka andaaz kabhi hota nahi #shair

    Hothon par gila ankhon me tabassum rakhna, Uff tauba tera haal e shikasta guftagu karna.

    Liked by 1 person

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s