ना पाया 

आवाज़ तेरी कानो में गूँजती ,

पर आँखों को दिख ना पाया ।

चाहत पाने की ,बिजली सी कौंधी,

अश्रुओं का बहाव थम न पाया ।

विरह की बरखा ऐसी बरसी ,

बाहों में भी सिमट ना पाया ।

ऐसे छलके वो दो प्याले,

पलकों से फिर संभल ना पाया ।

देख मेरे मन के अगन को ,

आसमान भी रुक ना पाया ।

सिमट गया बादलों में ऐसे ,

फिर बरसने से रुक ना पाया ।

मन भी रोया जैसे बरसा .. 

चाहकर तुझको भूल न पाया .. “निवेदिता ”

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