छलिया

छलिया

मैं मीरा बन तड़प रही ,

वो गोपियों संग रचाए रास,

दूर बसी क्यूँ मीरा भाए ?

जब रहते राधा के पास ;

 मैं प्रेम में जोगन बनी , 

उनके मन को गोपी ही भाए ।

 मैं उनका नाम रटते नहीं थकती , 

उनको मेरा नाम नहीं भाए । 

पूजूँ नित प्रातःनिशि मध्याह्न , 

पर कान्हा तो रहा छलिया

सिर्फ़ दूसरों का ही रहता ध्यान ।। 

“निवेदिता”..

आभार 


व्यवहार कुशलता और माधुर्य,

आतिथ्य सत्कार और मिठास ,

संस्कृति विनम्रता और संस्कार ,

मानो अपना ही है यह इतिहास ,

दोस्त बनाना और निभाना ,

जन्म से अपने ख़ून में थी । 

मेहमान घर आए तो ,

घर सजाओ – ख़ूब पकाओ,

मनहवार कर कर के खिलाओ,

जैसा है वैसा ही अर्पण करो ,

आतिथ्य में कहीं कमी न हो ,

तन मन धन से लग जाओ ।

ऐसा भाव मेरे देश का है ,

आगंतुक अतिथि भी देवता है ,

और सच बोलूँ तो अहम मेरा ,

इसरायल ने आज तोड़ा है ,

हाथ मिला सकता था वो ,

पर हाथ जो ऐसे जोड़ा है ।


हमारे प्रधान सेवक की सेवा करने,
मानो  वो बिन जूतों के दौड़ा है ।

रूप रंग नहीं प्रेम का कोई ,

ना मित्रता की कोई जाती है ,

दोस्ती के रंग उन फूलों में,

बनकर यादें, महकाती हैं ।

दोस्ती की ऐसी तस्वीरों से,
दुश्मन के दिल जला रहे ,

झूठ की चादर ओढ़े ,

गीदड़ भबकि मार रहे ,

जब अंगूर खट्टे दिखने लगे,

खिस्याएँ चीनी खंबा नोच रहे । 

ऐसा आतिथ्य सत्कार पाकर ,

एक सवाल मन में कौंधा है ,

हम जैसा कहूँ ,या बेहतर है ?

यह कहना तो मुश्किल है ,

बस मेरा “आभार “ही उत्तर छोड़ा है । “निवेदिता ”


*Gratitude from Me and my Country to Israel and Prime Minister Sh. Benjamin Netanyahu . 

ना पाया 

आवाज़ तेरी कानो में गूँजती ,

पर आँखों को दिख ना पाया ।

चाहत पाने की ,बिजली सी कौंधी,

अश्रुओं का बहाव थम न पाया ।

विरह की बरखा ऐसी बरसी ,

बाहों में भी सिमट ना पाया ।

ऐसे छलके वो दो प्याले,

पलकों से फिर संभल ना पाया ।

देख मेरे मन के अगन को ,

आसमान भी रुक ना पाया ।

सिमट गया बादलों में ऐसे ,

फिर बरसने से रुक ना पाया ।

मन भी रोया जैसे बरसा .. 

चाहकर तुझको भूल न पाया .. “निवेदिता ”