तेज़ाब 

कल प्रेम में मीरा ने ज़हर पी लिया ,

पर मैं असमर्थ कड़वी सच्चाई पीने में ,


मुस्कुराने से डरती हूँ , डर छुपाकर सीने में ;


डर कर पानी भी आज फूंकर पिया ,


कहीं तेज़ाब ना मिला हो पीने में ;


ताज कभी मुमताज़ की यादों मैं बना था ,


वो शांत सफ़ेद संगमरमर का खड़ा,


गवाह ,महोब्बत के मरकर भी जीने में ;


आज महोब्बत में संग मर-मर कर जीते हैं,


डाले तेज़ाब मुहब्बत के नाम का सीने में ;


प्रेम हीर रांझा सा पाक था अब तो बदनाम,


दहशत है आराम से घर पर सोने में;


वो मन चले जो उन्हें बे आबरू कर झुलसा गये ,


ढूँढ लाओ उन्हें ,आज छुपे हैं जाने किन कोनो में ;


कुंठित है मन मेरा , तन तो लूट ही गया ,


पर निवेदन है हर निवेदिता का मत दो पनाह ,


मत पिलाओ दूध ऐसै आस्तीन के सापों को ,


वरना ,कल तुम्हारी बेटियों की बोटियाँ भी ,


मिलादि जाएँगी उन तेज़ाब की बोतलों में । “निवेदिता”

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12 thoughts on “तेज़ाब 

  1. कल प्रेम में मीरा ने ज़हर पी लिया ,

    पर मैं असमर्थ कड़वी सच्चाई पीने में ,
    wah wah kiya kehne aap ki post padh kar khushi huyii

    Liked by 1 person

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