समझौता

दिल को छू लेने वाले भाव ,असीमित विवशताओ के बीच ये जीवन बस कर्म और धर्म में बँटा हुआ ।

poemsbyarti

चलो आज करें हम एक समझौता

एक समझौता

जिसमें प्रेम न होगा

न होगा जिसमें अहंकार ही

एक रिश्ता होगा सर्वसम्मति का

एक रिश्ता केवल आवश्यकताओं का!

विवाह बंधन में बंध जाएंगे

एक ही छत में रह जाएंगे

मन – मन से न मिलने पाएं

और तन क्षण में कईं बार मिलेंगे।

न जोर होगा तुमपर मेरा

न मेरे जीवन पर अधिकार तुम्हारा

दिन व्यस्तता से बीत सकें

और थकान मिटाने का साधन तुम!

देखो, काम वासना होती सब में

और प्रेम पवित्र बंधन है

समय कहां निभाने इसको

किंतु भोग लिप्सा आवश्यक है।

-आरती मानेकर

Just tried to write something out of my comfort zone!!!

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3 thoughts on “समझौता

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