गुम कहाँ हो गए 

बचा के रखे थे जो सपने,जाने कहाँ ख़र्च हो गये..


छुपा के रखे थे जो लम्हें,

जाने कहाँ गुम हो गये…


आपने तो मुड़कर भी न देखा,

नज़रों से यूँ ओझल हो गये..


दिया जाने का फ़रमान हमें

लापता ख़ुद कहाँ हो गये .. 


मुड़ मुड़कर तो बहुत देखा ,

पूछा भी बहुत राहगीरों से ,


पर जो खो गये उन पगडंडियों पे ,

मिला करते हैं बस तक़दीरों से .. निवेदिता

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22 thoughts on “गुम कहाँ हो गए 

  1. आपकी कविता ने तो मेरी आँखो में आँसू ल दिये.
    बचा के रखे थे जो सपने,जाने कहाँ ख़र्च हो गये..
    छुपा के रखे थे जो लम्हें,
    जाने कहाँ गुम हो गये

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    1. 👌🥂यह तो अपार हर्ष की बात है अगर ऐसा है तो , लेखक या कवि तभी सफल होता है जब लिखा हुआ अपने गंतव्य तक पहुँच जाए । सहर्ष धन्यवाद रेखा .. you just made my day 🙂

      Liked by 1 person

  2. जेहन में बसते थे जो आरजू की तरह
    पल भर जाने काफूर हो गये
    कुछ सपने मेरे भी थे साहब
    जो कहीं गुम हो गये हैं

    Liked by 1 person

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