चली जाओ 

सुनो जो भी हो तुम नाम में क्या रखा है , 


हो गये रास्ते जुदा 

और तंग ना करो मुझे 


क़ाबिल नहीं तुम मेरी

न प्रीत तुमसे है मेरी 


तुम निवेदन करो चाहे 

मेरी नज़रों में लड़ती हो .. 


थोपती हर बात मुझपर 

मुझे हैरान करती हो ,


चली जाती क्यूँ नहीं ,

क्यूँ नहीं मुझे छोड़ती हो..


थक गया हूँ तुझसे मैं

आफ़त सी अब लगती हो ..


वो जो मेरी है भली है ,

नहीं कुछ भी कहती है ,


तुम नहीं लायक मेरी

क्यूँ पीछे पड़ती हो ?..


छोड़ दो छोड़ दो ,

कह दिया हर बार तुम्हें ..


पर क्यूँ मेरे सिर पर 

फिर एक बार , तलवार 

की तरह लटकी हो .. निवेदिता

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25 thoughts on “चली जाओ 

    1. मतलब की नायक ने जिसकी छवि अपने मन में बनायी है वह बहुत ही भली सी है जो उसे कभी रोकती टोकती नहीं ।

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  1. होता है कभी कभी क्रोध की अग्नि में जल रहे व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश की है

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      1. बिलकुल सम्भव है, कवि अपने आस पास घटित होती किसी भी घटना के संदर्भ में लिख सकता है । मैं दार्शनिक कवि हूँ सो ऐसा सम्भव है 🙂

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            1. Haaye main fed up ho gayi aan mundeya
              Sunn sunn ke tere dukh de ve

              Mainu kala chashma
              Ho mainu kala kala kala..
              Ho mainu kala chashma jajta ae
              Jachda hai gore mukhde te
              Mainu kala chashma jajta ae
              Jach da hai gore mukhde te 😎😎😎😎

              This must be your state, right? 😜😜😜

              Liked by 1 person

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