धनुर्मास

“कर्कटे -पूर्वफाल्गुन्यां तुलसीकाननोद्भवाम्।पाण्ड्ये विश्वम्भरां गोदां वन्दे श्रीरंगनायकीम्।। 


कलि के प्रारम्भ में नीलादेवी राधा श्रावण शुक्ल तृतीया पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में श्रीधन्वीपुर ( विल्लीपुत्तुर ) तमिलनाडु तुलसीवन से प्रकट हुईं। 

श्रीवैकुण्ठवल्ली नीलादेवी कालिन्दी कुल कमलवन से द्वापरान्त में प्रकट हुई थीं।

 अयोनिजा बालिका का पालन श्रीवृषभानु गोप ने किया था, नाम रखा था आराधिका जो बाद में श्रीराधिका या  श्री जी राधा कहलायीं। इस अयोनिजा कन्या का नाम आलवारमुकुटमणि श्रीविष्णुचित्त स्वामी जी ने रखा ‘गोदा’।

हेमन्त ऋतु के प्रथम मास मार्गशीर्ष में व्रजवल्ली गोपी राधा ने अपनी सहचरी गोपियों के साथ श्रीकृष्ण प्राप्ति के कात्यायनी व्रत रखा,  उस समय स्वयं श्रीकृष्ण लीला कर रहे थे।

 वे ही राधा ,गोदा बनकर कृष्ण प्राप्ति के प्रयासरत थीं ।वे जानतीं थीं कि प्रेम व मोक्ष के स्त्रोत ,उद्गम व अंत “श्री कृष्ण”  मात्रही हैं,  इसे सिद्ध करने के लिये श्रीकृष्ण को ३० प्रकार से गोपीभाव भावित होकर गीत गाकर तादात्म्य स्थापित कर लिया । 

‘ गोपिका गीत’ में १९ प्रकार से श्रीकृष्णगतप्राणा गोपिका तादात्म्य स्थापित कर लिया। 

गोपिकाओं में भगवत प्राप्ति से अहंकार का भाव देखकर श्रीभगवान् अन्तर्धान हुये तो गोपिकायें उन्हें प्राप्त करने का उपाय करने लगीं ; उन्हें ढुंढने लगीं,वे नहीं मिले। श्री क्रिष्ण के विलोप हो जाने पर विरह वेदना में विव्हल गोपिकाओं ने गोपिका गीत से उन्हें मनाने की चेष्ठा की।


श्रीकृष्णोऽहं का अनुसन्धान किया, लीला मंचन किया, फिर भी जब वे नहीँ मिले, तब श्रीजी राधाजू के शरणागत हुईं , श्रीजी की कृपा से गोपिकायें यमुनातट पर पहुँच कर सामवेदरुप से गीत का गायन करने लगीं ।

 ( राधासप्तशती ३.१३५ ) श्रीकृष्ण प्रेमोन्मादिनी गोपिकायें सारे संकोच को छोड़कर केवल एक ही चेष्टा कर रही थीं एक ही लालसा थी उनके मन में श्रीकृष्ण दर्शन हो कैसे ? फ़ूट- फूटटकर सुन्दर स्वर में रुदन करने लगीं। उनके अतिशय प्रेमाश्रु से प्लावित परमात्मा श्रीकृष्ण प्रकट हुए व सौशिल्य दर्शन कराये। 

 श्रीकृष्ण के साथ वें प्रेम की पंचम अवस्था में पहुँच गईं। प्रणयावस्था में अपने और प्रियतम के अंगों तथा वस्त्र, आभूषण वस्तुओं में सर्वथा एकत्व के कारण कभी सम्भ्रम-संकोच नहीं होता।     

  “स्वांगे प्रियतमस्यांगे वस्त्राभूषादि वस्तुषु। सर्वत्रैकत्वभावेन सम्भ्रमो नात्र जायते”

गोपिकाओं के सारे भाव गोदाजी में बाल्यकाल से ही दृष्टिगोचर हो रहे थे ।हेमन्तु ऋतु के प्रथम संक्रान्ति मास में उन्होंने श्रीकृष्णव्रत प्रारम्भ किया जिसे हम “श्रीगोदाम्बा उत्सव ” या धनुर्मास उत्सव कहते हैं।

P.S. : त्रुटियों अथवा संयंमित ज्ञान के वजह से किसी प्रकार की भूल हुई हो तो क्षमा प्रार्थी हूँ । ज्ञान वृद्धि हेतू प्रकाश डालें तो सादर आभार होगा । … “निवेदिता”

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13 thoughts on “धनुर्मास

  1. ज्योत्सना जी बहुत बढिया से आपने लिखा है श्री राधारानी पर, कात्यानी व्रत की बड़ी महिमा बताई गई है शास्त्रो में। आपको बहुत बहुत साधुवाद 🙏🏼🙏🏼

    न खलु गोपिकानन्दनो भवानखिलदेहिनामन्तरात्मदृक्
    विखनसार्थितो विश्वगुप्तये सख उदेयिवान् सात्वतां कुले

    राधा जू बरसाने वाली है
    जब प्रसन्न होती है तो
    साधक पर भक्ति ज्ञान वैराग्य की बरसात करती है 🙏🏼

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