फूल 

जब मैं मौन हूँ तो गौण नहीं ,कहीं विस्मृत हूँ शायद 

शायद, इन हवाओं में , इन फ़िज़ाओं में कहीं 

कहीं ,इन फूलों में तो नहीं ? या फिर शायद हाँ 

हाँ !इन फूलों में, जहाँ शब्द हार जाएँ फूल बोलते हैं


बोलते हैं श्रीमान ! ज़ुबान से नहीं रंगों से अपने

अपने महक से , सौंदर्य से मिठास से,


मीठास से रस घोलते हैं , ठग लेते हैं काले भ्रमर को 
भ्रमर को आसक्त करते है , की वो उनमें खो जाये 

जाये तो कहाँ जाये , लट्टु इस चर्म तक की न जाने 

जाने -अनजाने ,कब शाम ढल जाए और वह,

वह ,पगला ! उन फूलों की महक में डूबा अपने प्राण खो दे .. 

 “निवेदिता ”


#सिंह अवलोकन छँद  # photography # Nature 

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43 thoughts on “फूल 

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          Liked by 1 person

  1. अब फूल नही मुस्कराते हैं
    मुरझाए से पाए जाते है
    प्रदूषण की मार में करहाते हैं
    भ्रमर भी अब कहां पाए जाते है
    शहर अब इमारतों के जंगल से नजर आते हैं ।

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    1. कटु सत्य है , पर छोटी छोटी कोशिश हम सभी करें तो शायद थोड़ा कुछ बचाया जा सकता है , ऐसा मेरा मनमाना है व मेरी आशा भी है । ब्लॉग पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद 🙂
      जितना बच गया है
      उन्हें बचाए रखने की
      उम्मीद फिर भी क़ायम है ,
      स्वप्न माना कठिन हैं
      पर विश्वास है
      फूल पत्थर के जंगल से खिलाए जाएँगे
      भरमार आज भ्रम ही सही
      कल फिर गुंजन गाएँगे …

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          Liked by 1 person

  2. ज्योत्सना जी बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढ़ने को मिल रही है,
    सदैव की माफिक सुंदर और ज़ज़्बाती,बहुत खूब.

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