जागते सोते 

सोते सोते जाग गई ,

कहीं खोते खोते मिल गई ,

स्वप्न देखे जो बचपन में,

अर्ध योवन में जी गई ,

सोते सोते जाग गई ..



स्वप्न में तुझसे मिली ,

बंद आँखों में छिपी ,

तेरी तस्वीर कोरे काग़ज़ ,

पर उकेर गई ,

सोते सोते जाग गई ..



पता कहाँ था मालूम ,
नींदों में गलियाँ देखीं,

ढूँढते हुए तुझे,
कहीं तेरे दर पे आगई,

तभी सोते सोते जाग गई…


तूने भी झूठे स्वप्न दिखाए 

उन सपनों को सच मान गई

कड़वे बोल ज्यों ही तेरे 

मेरे कानों में पड़े 

सोते सोते फिर जाग गई.. “Nivedita”

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52 thoughts on “जागते सोते 

      1. Nivedita, its a pleasure reading your blog. Theres so much substance in everything you write. Food to the soul, like I always say. Or to put it in a batter way, bhaat and dal to the soul ;).
        Thanks to you for serving it the best ways possible 🙂

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  1. कौन है इतना निर्दयी की आप से कड़वे बोल सके? भगवान माफ़ नहीं करेगा उसे।

    बेहतरीन काव्यरचना है, अद्वितीय।

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    1. धन्यवाद धीरज जी , भगवान सभी को माफ़ करे और करता रहे , और ये कविता जो मेरी कृति है आसपास घटित होने वाली कोई भी घटना या शब्द से जुड़ी है , मुझे मेरे मित्र ने कहा, सोए नहीं या सोते सोते जाग गए , बस उसी पे लिखदी मैंने मुँझे किसीने कड़वे बोल नहीं बोले हैं । कविता को एक मोड़ देके छोड़ना मेरी शैली बन गयी है । सभी ख़ुश रहें ऐसी प्रार्थना होनी चाहिए

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