माँ भारती

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आग हूँ अंगार हूँ, तपते हुए रेगिस्तान में एक सर्द रात हूँ,
हसरतें भर रह गयी हैं शांत माहोल की,
कल्पनाओं में लड़ रही हूँ लड़ाई अपने बचाव की ,
अन्दर से  लावा खवल रहा  , सीना छलनी दाहक रहा है,
तमाम दुखों और दर्द को झेले संसार की शशक्त कमज़ोर कड़ी हूँ।
बाहर वाले बाद में खाएंगे मेरे बेटे मुझे नोच रहे हैं,
सोना चांदी उरानियम क्या कोयला तक को चबा रहे हैं,
जो रक्षक थे वोही  भक्षक हैं भक्षण मेरा कर रहे ,
और में एक माँ चुपचाप उन सांपों को दूध पिला रही हूँ
क्या रंग भेद , जात पात, लिंग भेद थे कम पड़े
जो मेरा बंटवारा करने आज  चले हो…
राज्यों में मुझको पहले ही  बांटा
आज खण्डों में खंडित होने जा रही हूँ…
असाम के राज में, बंगाल के कण में हूँ
बिहार का खनिज हूँ तोह महाराष्ट्र की जमीन भी में ही हूँ
में  वो दुखी  भारत हूँ जो कभी सोन चिरैय्या थी
आज क्षुब्ध ,दुखी, असहाय, और लाचार हूँ …. “Nivedita”

हिंदी

अंग्रेजी के पीछे भागें हिंदी की हिंदी होली
पाठ मास्टर ने जो सिखलाया उसको भूलगये हैं
ABCD जाने सभी कोई अ आ याद नही हैं
हिंदी को ही नीचा देखें खाना यहीं पे खाके ,
ऐसे बाबू जेंटल मैन हरदम झूठी शान ही हांकें।
भावनाओं का क़त्ल हुआ है संवेदना हुई विहफल
थैंकू ,सॉरी ,प्लीज हैं मुंह पे मायने हैं इनके खोखल
संस्कृत जिसकी जननी है वह हिंदी इतनी बलवान
सीखें सारी भाषायें पर न भूलें मातृ भाशा का ज्ञान
हिंदी पे बिंदी न जड़ दें रखें इसका ध्यान
गौरवान्वित हूँ में रहे सभीको यह भान
हिंदी मेरी भाषा है और मेरी हिंदी महान। …. ” निवेदिता “

बारिश

बारिश की बूंदों  में कहीं नमीं कम थी

जो रो रो के समंदर बनाये बैठे हैं
ख्वाबों में ख्वाब  बुने थे हमने जो
आँखें खुलते ही आंसुओं में बह गए 7

नारी तूं नारायणी

T R D”स्त्रियां तू सर्वं तद् रोचते कुलम ”
नव शक्ति, अष्ट लक्ष्मी नारी तूं नारायणी , नारी विद्दा , नारी सौभाग्य, नारी अमृत, नारी काम , नारी सत्य, नारी भोग,नारी योग। सभी रूपों स्वरूपों में नज़र आने वाली हे नारी! तूं मात्र देह नहीं जीवन का नज़रिया है। जिस कुल में नारी प्रसन्न रहती है वह कुल संपन्न रहता हे ऐसा तो हमारे वेदों में भी कहा गया है। जिसके बिना सृष्टि की संरचना ही नहीं सोची जा सकती उसी नारी की आज यह दुर्दशा है कि चहुँ ऒर सुह्योधन दुर और सुहसाशन दुः बना दीख पड़ता है। यह आज के काल की विडम्बना ही है की हर और दुर्योधनों और दुःशाशनो की बारात खड़ी नज़र आती है।
आदि काल से ही हमारी संस्कृति में नारी को पूजनीय माना गया है नारी को देवी की उपाधि दी गयी है। उसकी तुलना ब्रह्मशक्ति ,
वैष्णवी ,दुर्गा और शक्ति जैसी सबला के रूपों से की गयी है। नारी के अनेक रूप हैं,वह एक माँ एक बहन एक प्रेयसि, एक पत्नी, एक पुत्री है जिसके कारण ही सृष्टि चलायमान है।नारी वह गंगा है जो घर ,समाज , देश ही क्या उसने तो देवराज इंद्र के पाप तक खुद में समन्वित किया है।
हमारा आज फिर उस युग में पहुँच गया है जहां हमें अपनी लड़ाई स्वयं के बलबूते पे ही लड़नी पड़ेगी। माँ लक्ष्मी के स्वरुप से निकल कर महिषासुर मर्दिनी बनना पड़ेगा। मात्र शिकायतों और रोना रोने के बजाय एक दुसरे का सहारा और हिम्मत बनकर अत्याचारों का अंत करना पड़ेगा। इसका अर्थ यह कत्तई नहीं की शाश्त्र और कानून को हाथ में लें बल्कि इसका अर्थ है की हम हमारी ज़रूरतमंद बहनों को उनको मिल रही या मिल सकने वाले अवसरों से अवगत कराएं और उन्हें उनसे शिक्षित कराएं। “निवेदिता”

घाघ

क्षमा बडन को  चाहिए छोटन को उत्पात ,
कहने वाले कह गए,बीत गयी वोह बात ॥ 
 
अब तो हालत यह हे ज्यों बड़ा त्यों घाघ, 
अन्दर से गीदड़ भये , ऊपर चोला बाघ ॥ 
 
आम मनुष बोरा रहा पकड़ने को जिनके पग ,
ओछी उतनी उनकी सोच जितना ऊँचा पद ॥ 
 
बन बेठा कोई कलक्टर कोई गवरनर ,
कोई अफसर बस करते सब आराम  ॥
 
गुरु हुआ  अर्थहीन सभी मगन मोह मद काम 
चाहे वोह धर्मानंद हो भिमानंद या  आसाराम ॥.…  ” निवेदिता ”  

BHAAT DAAL

दूर से दाल ने भात को देखा और उसके महक में झूमते हुए उसके केसरिया श्रृंगार पर मोहित होकर बोला ऐ सुंदर ! गर तूं मिल जाये तो मेरी किस्मत ही बदल जाये , तेरे संग मैं मिल जाऊं मुझमें तूं तो देख कैसे हम भात दाल से खिचड़ी बन जाएं।

Love is just like bhaat Daal , It is like we mix together so well and reach the eternity . The serene love never needs words for expression never wants to be said it is always felt , a gesture of togetherness which completes only when the duo meets. Like bhat is so tasteless without Daal and Daal so incomplete without Bhaat. Unconditional love is a blessing and reaches the bliss when found, the taste of love is tender sweet , little bitter , spicy with the feel Of  sacrament. Love is the dal which is always incomplete without care of Daal, likewise, Bhaat is the devotion which only completes with the true Soul of Bhaat . When the Mist of doubts disappears the sun is seen clear and love shines.dal bhat

लिहाफ़

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यूँ मेरे ख़त का जवाब आया,
लिफाफे में बंद एक गुलाब आया,
खोलते ही नज़र जो मेरी फूल,
पे पड़ी तेरी सूरत पे भी मुझे प्यार आया ;..

तुम दूर खड़े मुझे ताका करते थे,
उस भीड़ में तुम्हारा दीदार आया,
जब सबने मुझसे पुछा कौन हैं वोह,
तोह जवाब में होठों पे मुस्कान,
और नज़रों पे शर्म का पर्दा नज़र आया ;…

सर्द रात को खड़ी थी तुम्हारे इंतज़ार में,
दरवाज़े पर आह्ट ज़रा होले सी हुई,
तुमहें देख मेरे पैर जमीन पर ना रुके,
और देखते ही दौड़ कर तुम्हे गले लगाया ;..

तुमने भी टीस मेरे दिल की समझी,
बाँहों में भरकर होठों से मुझे सहलाया,
नज़रें झुकी और ज्यों ही मुझे होश आया,
शर्म से मैंने नाखून को दांतों तलेदबाया;..

रात जवान थी और हम बेसब्र,
हाथ जम गए पैर भी बर्फ हो रहे थे,
तुम्हारे गर्म स्पर्श से बर्फ पिहल रही थी,
चुमबकिया स्पर्श था तुम्हारा छूटना मुश्किल था ;…
चाहकर भी यह जिस्म अघोष का बंधन छुडा ना पाया….

नज़रों ने किया इशारा बत्ती भी तुमने भुझाया
ठिठुरन को दूर करने को लिहाफ नज़र आया ……… ” निवेदिता”

चेन्नई आपदा

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  •              उन बूढ़ी प्यासी नेहों को ,दूर अपनों को पाने की तलाश :
  •          पर चहुँ और मृत्यु का तांडव और गिद्ध कौवों का भोजन वो तैरती ल्हाश।
तमिलनाडु पे बारिश का कहर  एक राष्ट्रीय आपदा है , ऐसे में हर शहर कस्बा खास कर राजधानी चैन्नई प्रभावित हुआ है। जहां देखो वहां जलभराव है और उसमे फंसे इंसान , डूबे हुए मवेशियों की बेबस  ल्हाशें नज़र आती हैं।  यह संकट मात्र चेन्नई या तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है यह तो काले भ्रमर की भांति हमारे पूरे राष्ट्र के सर पर मंडरा रहा है।  अन्य राज्यों को भी इस प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने के लिए सतर्क हो जाना चाहिए चूँकि मौसम के चक्रवातों से आम जनजीवन के यकायक प्रभावित होजाना कोई  नई बात नहीं।  चेन्नई सरीखे आपदा से मुंबई , श्रीनगर , उत्तराखंड जैसे राज्य पहले ही प्रभावित हो चुके हैं।
सरकारी स्तर पर जो संभव बन पड़ रहा है  वह तो  होता ही है और हो भी रहा है लेकिन कुछ कमियां हमारे स्तर पर भी हैं जिन्में बदलाव लाना अतिआवश्यक है।  हमारे रहन सहन और दिनचर्या के लापरवाह तौर तरीके ऐसी आपदाओं को निमंत्रित करता है।   शहर आबादी के दबाव में अंधाधुंध तरीके से अनियोजित विकास कर रहे हैं और जल स्तर कम से कम हो रहा है।  जलवायू पर इन सब का प्रभाव बद से बदत्तर हो रहा है।
हमें भी पेरिस से सीख लेकर कुछ प्रयासों की  पहल  करनी चाहिए और अपने स्वार्थों को ताक पर रखते हुए निःस्वार्थ भाव से आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा हेतु अपने रोज़मर्रा के रहन सहन में बदलाव लाना चाहिए।  साथ ही अपने किसान भाइयों को  शिःक्षित कर फसलों के अवशेषों को जलाये बिना उनसे ईंधन व मवेशियों के चारों के प्रोयोग में लाने के लिए अवगत कराना चाहिए । प्रयासों के छोटे छोटे कदम आने वाली बड़ी बड़ी आपदाओं को रोक सकते  हैं।