घाघ

क्षमा बडन को  चाहिए छोटन को उत्पात ,
कहने वाले कह गए,बीत गयी वोह बात ॥ 
 
अब तो हालत यह हे ज्यों बड़ा त्यों घाघ, 
अन्दर से गीदड़ भये , ऊपर चोला बाघ ॥ 
 
आम मनुष बोरा रहा पकड़ने को जिनके पग ,
ओछी उतनी उनकी सोच जितना ऊँचा पद ॥ 
 
बन बेठा कोई कलक्टर कोई गवरनर ,
कोई अफसर बस करते सब आराम  ॥
 
गुरु हुआ  अर्थहीन सभी मगन मोह मद काम 
चाहे वोह धर्मानंद हो भिमानंद या  आसाराम ॥.…  ” निवेदिता ”  
Advertisements

4 thoughts on “घाघ

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s