चेन्नई आपदा

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  •              उन बूढ़ी प्यासी नेहों को ,दूर अपनों को पाने की तलाश :
  •          पर चहुँ और मृत्यु का तांडव और गिद्ध कौवों का भोजन वो तैरती ल्हाश।
तमिलनाडु पे बारिश का कहर  एक राष्ट्रीय आपदा है , ऐसे में हर शहर कस्बा खास कर राजधानी चैन्नई प्रभावित हुआ है। जहां देखो वहां जलभराव है और उसमे फंसे इंसान , डूबे हुए मवेशियों की बेबस  ल्हाशें नज़र आती हैं।  यह संकट मात्र चेन्नई या तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है यह तो काले भ्रमर की भांति हमारे पूरे राष्ट्र के सर पर मंडरा रहा है।  अन्य राज्यों को भी इस प्राकृतिक आपदाओं से लड़ने के लिए सतर्क हो जाना चाहिए चूँकि मौसम के चक्रवातों से आम जनजीवन के यकायक प्रभावित होजाना कोई  नई बात नहीं।  चेन्नई सरीखे आपदा से मुंबई , श्रीनगर , उत्तराखंड जैसे राज्य पहले ही प्रभावित हो चुके हैं।
सरकारी स्तर पर जो संभव बन पड़ रहा है  वह तो  होता ही है और हो भी रहा है लेकिन कुछ कमियां हमारे स्तर पर भी हैं जिन्में बदलाव लाना अतिआवश्यक है।  हमारे रहन सहन और दिनचर्या के लापरवाह तौर तरीके ऐसी आपदाओं को निमंत्रित करता है।   शहर आबादी के दबाव में अंधाधुंध तरीके से अनियोजित विकास कर रहे हैं और जल स्तर कम से कम हो रहा है।  जलवायू पर इन सब का प्रभाव बद से बदत्तर हो रहा है।
हमें भी पेरिस से सीख लेकर कुछ प्रयासों की  पहल  करनी चाहिए और अपने स्वार्थों को ताक पर रखते हुए निःस्वार्थ भाव से आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा हेतु अपने रोज़मर्रा के रहन सहन में बदलाव लाना चाहिए।  साथ ही अपने किसान भाइयों को  शिःक्षित कर फसलों के अवशेषों को जलाये बिना उनसे ईंधन व मवेशियों के चारों के प्रोयोग में लाने के लिए अवगत कराना चाहिए । प्रयासों के छोटे छोटे कदम आने वाली बड़ी बड़ी आपदाओं को रोक सकते  हैं।
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